
भारत 2026: सनातन धर्म और आध्यात्मिक पुनरुत्थान | मेदिनी ज्योतिष
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मूलांक 6 : प्रेम, सौन्दर्य, समर्पण और भगवद्गीता का संदेश
मूलांक 6 शुक्र–प्रधान, प्रेम और सौन्दर्य का अंक है। यह लेख दिखाता है कि गीता के प्रिय भक्त–लक्षण 6 के प्रेम को आशीर्वादमय समत्व में कैसे बदल सकते हैं।
मूल स्वभाव
मूलांक 6 शुक्र–तत्त्व का प्रतिनिधि है –
ऐसे जातक अपने परिवार, मित्रों और समाज के लिए
“पोषण” का केन्द्र बन सकते हैं।
नकारात्मक रूप में यह अंक भोग–प्रवृत्ति, अत्यधिक आसक्ति, दिखावटी सन्तुलन और समझौता–प्रियता दे सकता है।
गीता का आधार–श्लोक (भगवद्गीता 12.15)
“यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥”
संक्षिप्त भावार्थ
जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता
और जो स्वयं भी लोक से उद्विग्न नहीं होता,
जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से मुक्त है –
वह भगवान को प्रिय है।
मूलांक 6 और गीता–संदेश
जीवन–क्षेत्रों में प्रभाव
दोष और संतुलन
दैनिक साधना–सूत्र (मूलांक 6 के लिए)
निष्कर्ष
मूलांक 6 यदि गीता के इस समत्व–संदेश से जुड़ जाए,
तो उसका प्रेम केवल आकर्षण नहीं,
बल्कि आशीर्वाद बन जाता है।
मूलांक 6 शुक्र-स्वभाव, प्रेम, सौन्दर्य और गृहस्थ-धर्म से जुड़ा है। गीता 12.15 के “यस्मान्नोद्विजते लोको…” श्लोक के आधार पर यह लेख स्पष्ट करता है कि 6 मूलांक जातक कैसे सम्बन्धों में आसक्ति और दिखावे से ऊपर उठकर ऐसा सन्तुलन बना सकते हैं, जहाँ अपने-पराये सभी को शान्ति और सुरक्षा महसूस हो।
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