
भारत 2026: सनातन धर्म और आध्यात्मिक पुनरुत्थान | मेदिनी ज्योतिष
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मूलांक 2 : संवेदनशीलता, करुणा और भगवद्गीता का संदेश
मूलांक 2 चन्द्र–प्रधान कोमल ऊर्जा है। यह लेख बताता है कि गीता के भक्ति–योग के माध्यम से 2 की भावुकता को करुणा और समत्व में कैसे बदला जा सकता है।
मूल स्वभाव
मूलांक 2 चन्द्र–तत्त्व से सम्बद्ध है –
ऐसे जातक दूसरों की भावनाएँ तुरंत पकड़ लेते हैं,
मध्यस्थता और पुल–निर्माण में कुशल होते हैं।
लेकिन अत्यधिक संवेदनशीलता उन्हें जल्दी आहत, असुरक्षित और निर्णय–विहीन भी बना सकती है।
गीता का आधार–श्लोक (भगवद्गीता 12.13)
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥”
संक्षिप्त भावार्थ
जो किसी से द्वेष नहीं करता,
सबके प्रति मैत्रीभाव और करुणा रखता है,
ममता और अहंकार से रहित है,
सुख–दुःख में समभाव रखता है और क्षमाशील है –
वह भगवान के लिए अत्यन्त प्रिय भक्त है।
मूलांक 2 और गीता–संदेश
जीवन–क्षेत्रों में प्रभाव
दोष और संतुलन
दैनिक साधना–सूत्र (मूलांक 2 के लिए)
निष्कर्ष
मूलांक 2, गीता के भाव–पथ पर चलकर
संवेदनशीलता को दुर्बलता नहीं,
वरन् दिव्य करुणा और समत्व में रूपान्तरित कर सकता है।
मूलांक 2 चन्द्र-प्रधान, कोमल और सम्बन्ध-केन्द्रित ऊर्जा का सूचक है। गीता 12.13 के “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्रः करुण एव च” श्लोक के आधार पर यह लेख बताता है कि 2 मूलांक कैसे भावुकता को करुणा, क्षमा और समत्व में बदलकर सच्चे “प्रिय भक्त” के गुण विकसित कर सकता है।
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