
भारत 2026: सनातन धर्म और आध्यात्मिक पुनरुत्थान | मेदिनी ज्योतिष
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मूलांक 1 : नेतृत्व, आत्मविश्वास और भगवद्गीता का संदेश
मूलांक 1 सूर्य–तत्त्व का सूचक है – नेतृत्व, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता इसकी मुख्य धुरी हैं। यह लेख बताता है कि मूलांक 1 जातक अपने अहंकार को कैसे आत्मबल और धर्ममय नेतृत्व में बदल सकते हैं।
मूल स्वभाव
मूलांक 1 सूर्य-तत्त्व से सम्बद्ध माना जाता है –
नेतृत्व, स्वाभिमान, स्वतंत्र निर्णय, आगे बढ़कर मार्ग बनाना, दायित्व उठाना और “मैं कर सकता हूँ” का आन्तरिक विश्वास।
ऐसे जातक:
चुनौती यह कि यही ऊर्जा कभी–कभी अहंभाव, हठ, एकतरफ़ा निर्णय और दूसरों की उपेक्षा का रूप भी ले सकती है।
गीता का आधार–श्लोक (भगवद्गीता 6.5)
“उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”
संक्षिप्त भावार्थ
मनुष्य को चाहिए कि अपनी ही शक्ति से स्वयं को ऊपर उठाए, स्वयं को नीचे न गिराए।
अपना मन ही उसका मित्र भी बन सकता है और वही शत्रु भी – यह इस पर निर्भर है कि वह मन को कैसे चलाता है।
मूलांक 1 और गीता–संदेश
जीवन–क्षेत्रों में प्रभाव
दोष और संतुलन
दैनिक साधना–सूत्र (मूलांक 1 के लिए)
निष्कर्ष
जब मूलांक 1 गीता के इस संदेश के अनुसार अपने मन को मित्र बना लेता है,
तब उसका नेतृत्व केवल व्यक्तिगत विजय नहीं रहता, बल्कि धर्म, सत्य और प्रकाश का वाहक बन जाता है।
मूलांक 1 सूर्य-स्वभाव, नेतृत्व और आत्मविश्वास का प्रतीक है। इस लेख में गीता 6.5 के “उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानम्” श्लोक के आधार पर समझाया गया है कि मूलांक 1 जातक अपनी ऊर्जा को अहंकार से बचाकर सही आत्म–उत्थान और धर्ममय नेतृत्व में कैसे बदल सकते हैं।
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