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मूलांक 9 – साहस, धर्मयुद्ध और भगवद्गीता का निमित्त-भाव

मूलांक 9 मंगल-प्रधान साहस, संघर्ष और त्याग का प्रतीक है। गीता 11.33 के “निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” श्लोक के आधार पर यह पोस्ट दिखाती है कि 9 मूलांक की युद्ध-ऊर्जा को व्यक्तिगत अहंकार से हटाकर धर्मयुद्ध, संरक्षण और त्याग की दिशा में कैसे ले जाया जाये, ताकि उसका क्रोध भी लोक-हित में रूपान्तरित हो।

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मूलांक 8 – कर्मफल, न्याय और गीता का “कर्मण्येवाधिकारस्ते” जीवन-सूत्र

मूलांक 8 शनि-सम्बन्धित कर्म, न्याय और परीक्षाओं का अंक है। गीता 2.47 के “कर्मण्येवाधिकारस्ते” श्लोक के माध्यम से यह लेख बताता है कि 8 मूलांक जातक शिकायत और भय से ऊपर उठकर निष्काम कर्म, धैर्य और न्यायप्रिय जीवन जीते हुए अपने संघर्षों को साधना में कैसे बदल सकते हैं।

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मूलांक 7 – शोध, वैराग्य और गुफा-सदृश एकान्त पर गीता का योग-मार्ग

मूलांक 7 केतु-तत्त्व, शोध और वैराग्य का प्रतीक है। गीता 6.10 के “योगी युञ्जीत सततं आत्मानं रहसि स्थितः” श्लोक के सहारे यह पोस्ट दिखाती है कि 7 मूलांक की अकेलेपन और प्रश्नशीलता को कैसे पलायन नहीं, बल्कि संयमित ध्यान-योग और गहन आध्यात्मिक खोज में बदला जा सकता है।

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मूलांक 6 – प्रेम, परिवार और भगवद्गीता के समत्वपूर्ण सौन्दर्य की शिक्षा

मूलांक 6 शुक्र-स्वभाव, प्रेम, सौन्दर्य और गृहस्थ-धर्म से जुड़ा है। गीता 12.15 के “यस्मान्नोद्विजते लोको…” श्लोक के आधार पर यह लेख स्पष्ट करता है कि 6 मूलांक जातक कैसे सम्बन्धों में आसक्ति और दिखावे से ऊपर उठकर ऐसा सन्तुलन बना सकते हैं, जहाँ अपने-पराये सभी को शान्ति और सुरक्षा महसूस हो।

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मूलांक 5 – बुद्धि, संचार और भगवद्गीता की एकाग्र “व्यवसायात्मिका बुद्धि”

मूलांक 5 बुध-प्रधान, तेज-तर्रार और परिवर्तनशील बुद्धि का संकेत है। गीता 2.41 के “व्यवसायात्मिका बुद्धिर् एकेह कुरुनन्दन” श्लोक से यह पोस्ट बताती है कि 5 मूलांक को अनेक विकल्पों की भीड़ में बिखरने के बजाय एक ध्येय पर केन्द्रित बुद्धि विकसित करनी चाहिए, तभी उसकी चतुराई सृजनशील शक्ति बनती है।

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मूलांक 4 – श्रम, अनुशासन और गीता का निष्काम कर्म–योग

मूलांक 4 स्थिरता, मेहनत और व्यवहारिक व्यवस्था का अंक है। गीता 3.19 के “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर” श्लोक के आधार पर यह लेख समझाता है कि 4 मूलांक जातक अपने कठोर श्रम और सिस्टम-सोच को निष्काम कर्म-योग बना कर भीतर की चिड़चिड़ाहट से कैसे मुक्त हो सकते हैं।

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मूलांक 3 – ज्ञान, गुरु-भाव और भगवद्गीता का बुद्धि-योग

मूलांक 3 गुरु-तत्त्व, ज्ञान और व्यवस्था का प्रतिनिधि है। गीता 10.10 के “ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते” के माध्यम से यह पोस्ट दिखाती है कि 3 मूलांक के ज्ञान, शिक्षण और प्रबन्धन क्षमता को कैसे “बुद्धि-योग” में बदला जा सकता है, ताकि विद्या अहंकार नहीं, साधना बने।

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मूलांक 2 – संवेदनशीलता, करुणा और भगवद्गीता के प्रिय भक्त के लक्षण

मूलांक 2 चन्द्र-प्रधान, कोमल और सम्बन्ध-केन्द्रित ऊर्जा का सूचक है। गीता 12.13 के “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् मैत्रः करुण एव च” श्लोक के आधार पर यह लेख बताता है कि 2 मूलांक कैसे भावुकता को करुणा, क्षमा और समत्व में बदलकर सच्चे “प्रिय भक्त” के गुण विकसित कर सकता है।

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मूलांक 1 – नेतृत्व, आत्मविश्वास और भगवद्गीता का आत्म–उत्थान संदेश

मूलांक 1 सूर्य-स्वभाव, नेतृत्व और आत्मविश्वास का प्रतीक है। इस लेख में गीता 6.5 के “उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानम्” श्लोक के आधार पर समझाया गया है कि मूलांक 1 जातक अपनी ऊर्जा को अहंकार से बचाकर सही आत्म–उत्थान और धर्ममय नेतृत्व में कैसे बदल सकते हैं।

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